भारत में रसोई के खर्च पर बोझ झेल रहे आम लोगों के लिए एक राहतभरी खबर आई है। सितंबर 2025 में घरेलू वेजिटेरियन थाली की कीमत सालाना आधार पर 10% घटकर 28.17 रुपए रह गई है। पिछले साल इसी महीने यानी सितंबर 2024 में यही थाली 31.30 रुपए की पड़ रही थी। यह जानकारी कैपिटल मार्केट कंपनी क्रिसिल ने अपने “फूड प्लेट कॉस्ट इंडिकेटर” में साझा की है।
आलू-प्याज-टमाटर ने घटाई थाली की कीमत
क्रिसिल की “राइस रोटी रेट (RRR)” रिपोर्ट के मुताबिक, अगस्त की तुलना में सितंबर में वेजिटेरियन थाली 3% सस्ती हुई है। अगस्त में यह थाली 29.1 रुपए की थी, जबकि सितंबर में इसकी कीमत घटकर 28.17 रुपए रह गई।
इस कमी के पीछे मुख्य कारण हैं — आलू, प्याज और टमाटर के दामों में गिरावट।
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प्याज के दाम 46% गिरे हैं, क्योंकि रबी फसल की अच्छी आवक और पर्याप्त उपलब्धता रही।
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आलू की कीमतें 31% कम हुईं, कोल्ड स्टोरेज यूनिट्स से बड़े पैमाने पर स्टॉक रिलीज किए जाने से सप्लाई बढ़ी।
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टमाटर की कीमतें भी 8% नीचे आईं, जिससे थाली की कुल लागत पर सीधा असर पड़ा।
वेज थाली में आलू और टमाटर की हिस्सेदारी करीब 24% होती है, वहीं दालों के दामों में भी 16% की कमी देखने को मिली। हालांकि, अगर वेेजिटेबल ऑयल (21% बढ़त) और एलपीजी सिलेंडर (6% बढ़त) के दाम न बढ़े होते, तो थाली और सस्ती हो सकती थी।
नॉन-वेज थाली भी सस्ती, लेकिन रफ्तार धीमी
वहीं नॉन-वेज थाली की कीमत सितंबर में सालाना आधार पर 6% घटकर 56 रुपए रह गई है। पिछले साल यह 59.30 रुपए की थी। हालांकि, अगस्त की तुलना में इसमें 3% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
क्रिसिल का कहना है कि नॉन-वेज थाली की लागत में गिरावट की रफ्तार धीमी रही क्योंकि ब्रॉयलर (चिकन) की कीमत केवल 1% घटी।
इस साल चिकन उत्पादन में कमी और सप्लाई में बाधाओं के कारण दाम ज्यादा नहीं गिरे। ध्यान देने वाली बात यह है कि नॉन-वेज थाली की कुल लागत में ब्रॉयलर की हिस्सेदारी 50% होती है।
ऐसे तय होती है थाली की कीमत
क्रिसिल चारों जोनों — उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भारत — की औसत फूड प्राइस के आधार पर घर पर तैयार होने वाली थाली की लागत तय करता है।
इसमें अनाज, दालें, सब्जियां, चिकन, मसाले, खाद्य तेल और एलपीजी जैसे घटकों की कीमतों का औसत लिया जाता है।
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वेज थाली में रोटी, चावल, दाल, दही, सलाद और तीन सब्जियां (प्याज, टमाटर, आलू) शामिल होती हैं।
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नॉन-वेज थाली में दाल की जगह चिकन शामिल किया जाता है।
ध्यान देने योग्य है कि क्रिसिल द्वारा बताई गई यह लागत घर पर पकाई गई प्रति थाली की कीमत है। इसमें होटल या रेस्टोरेंट की तरह ओवरहेड कॉस्ट, स्टाफ वेतन या प्रॉफिट मार्जिन शामिल नहीं होते।
निष्कर्ष
सितंबर में थाली की घटती कीमतों ने आम आदमी को थोड़ी राहत जरूर दी है, लेकिन खाद्य तेल और गैस जैसी आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती दरें अब भी चिंता का विषय हैं। यदि आने वाले महीनों में कृषि आपूर्ति और स्थिर रहती है, तो उम्मीद है कि रसोई का बजट और हल्का हो सकता है।





