फिल्म “भागवत” रिव्यू: धर्म नहीं इंसानी अंधेरे की कहानी है यह सस्पेंस ड्रामा

On: October 17, 2025

फिल्म की शुरुआत में जब “लव जिहाद” और “धर्म परिवर्तन” जैसे शब्द सुनाई देते हैं, तो लगता है कि “भागवत” भी उन्हीं विवादित कहानियों में से एक होगी — लेकिन कुछ ही मिनटों में निर्देशक अक्षय शेरे यह भ्रम तोड़ देते हैं। फिल्म धीरे-धीरे एक ऐसी मनोवैज्ञानिक थ्रिलर में तब्दील हो जाती है जो धर्म नहीं, इंसान के भीतर छिपे अंधेरे और जुनून की परतें खोलती है।

कहानी: धर्म से नहीं, इंसान की विकृति से टकराती जांच

ACP विश्वास भागवत (अरशद वारसी) को अचानक रॉबर्ट्सगंज ट्रांसफर कर दिया जाता है, जहां पूनम मिश्रा नाम की एक लड़की रहस्यमय तरीके से लापता हो जाती है। यह मामला मीडिया और राजनीति के बीच धर्म परिवर्तन के मुद्दे में बदल जाता है। लेकिन जब विश्वास गहराई में जांच शुरू करते हैं, तो खुलासा होता है कि यह सिलसिला कई महीनों से चल रहा है — कई लड़कियां बिना कोई निशान छोड़े गायब हो चुकी हैं।

इस बीच, बनारस में समीर और मीरा की एक प्रेम कहानी चल रही होती है — जो पहले मासूम लगती है, लेकिन धीरे-धीरे डर और जुनून में बदल जाती है। फिल्म का क्लाइमैक्स साफ करता है कि यह कहानी न तो राजनीति की है, न धर्म की — यह इंसान की मानसिक अंधकारमय प्रवृत्तियों की कहानी है।

अभिनय: अरशद वारसी और जीतेन्द्र कुमार का दमदार प्रदर्शन

अरशद वारसी ने ACP विश्वास भागवत के किरदार को बेहद सच्चाई के साथ जिया है। एक थके हुए लेकिन ईमानदार पुलिस अफसर की झुंझलाहट, संवेदनशीलता और दृढ़ता उनके चेहरे पर साफ झलकती है।
वहीं, जीतेन्द्र कुमार ने अपने psychotic किरदार से दर्शकों को चौंका दिया है। उनकी शांत आंखों के पीछे छिपा डर फिल्म की रूह को छूता है।
सपोर्टिंग कास्ट (राघव, अर्जुन आदि) ने भी अपने हिस्से का काम ईमानदारी से निभाया है, हालांकि कुछ दृश्यों में गहराई की कमी महसूस होती है।

निर्देशन और तकनीकी पहलू

अक्षय शेरे ने फिल्म के माहौल और लोकेशन को यथार्थवादी बनाए रखने में सफलता पाई है। रॉबर्ट्सगंज और बनारस की गलियां कहानी को ज़मीन से जोड़े रखती हैं।
हालाँकि, बीच-बीच में कहानी की गति धीमी पड़ जाती है, जिससे सस्पेंस का असर थोड़ा कम हो जाता है।
एडिटर हेमल कोठारी की एडिटिंग अगर और क्रिस्प होती, तो फिल्म और प्रभावशाली बन सकती थी। सुमित सक्सेना के संवाद प्रभावी हैं, मगर कुछ हिस्सों में भारी एक्सपोज़िशन कहानी की रफ्तार को रोक देता है।

संगीत और सिनेमैटोग्राफी

मंगेश धाकड़े का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की असली ताकत है। जांच, रहस्य और भय के दृश्यों में म्यूज़िक वातावरण को और गहरा बना देता है।
“कच्चा काचा आम” और “गवाही दे” जैसे गीत कहानी में भावनात्मक जुड़ाव लाने की कोशिश करते हैं। सिनेमैटोग्राफी के ज़रिए पूर्वांचल की गलियों, मंदिरों और अंधेरे को बेहद खूबसूरती से कैद किया गया है।

“दहाड़” से तुलना

“भागवत” और “दहाड़” दोनों ही समाज में फैले भय और गायब होती लड़कियों की कहानियों को केंद्र में रखती हैं। लेकिन जहां “दहाड़” ने दर्शकों को धीरे-धीरे भीतर तक झकझोरा, वहीं “भागवत” उस स्तर तक नहीं पहुंच पाती। कहानी में ट्विस्ट हैं, मगर उनकी प्रस्तुति उतनी धारदार नहीं बन पाई।

फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं?

“भागवत” एक ईमानदार और सोचने पर मजबूर करने वाली कोशिश है, जो धर्म के बहाने इंसानी मानसिकता का आईना दिखाती है। कहानी नई नहीं, लेकिन उसका ट्रीटमेंट अलग है।
अगर आपको सस्पेंस-ड्रामा फिल्मों का शौक है और आप गहराई से किरदारों की मनोवैज्ञानिक परतें समझना पसंद करते हैं, तो “भागवत” को एक बार ज़रूर देखा जा सकता है — बस उम्मीदें बहुत ऊँची न रखें।

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